डायरी खोलते ही कभी लगता है कि लिखने लायक कुछ हुआ ही नहीं। लेकिन डायरी के लिए असाधारण दिन नहीं चाहिए। किसी बातचीत की एक पंक्ति, रास्ते में दिखी चीज़ या मन में अटका सवाल भी पहला वाक्य बन सकता है।
तीन वाक्यों की शुरुआत
पहला वाक्य लिखिए: आज क्या देखा? दूसरा: उसने आपको क्या सोचने पर मजबूर किया? तीसरा: कल किस बात पर ध्यान देना चाहेंगे? बस इतना लिखकर पन्ना बंद करना भी ठीक है।
उदाहरण के लिए: आज खिड़की के पास धूप थोड़ी देर रही। इतने छोटे विराम पर ध्यान देना अच्छा लगा। कल चाय पीते समय फोन दूर रखूँगा। इसे साहित्यिक उपलब्धि बनाने की आवश्यकता नहीं।
भाषा अपनी रखिए
जिस भाषा या बोली में बात सहज आती है, उसी से शुरू करें। वर्तनी या वाक्य ठीक करना चाहें तो बाद में कर सकते हैं। शुरुआती पन्नों का काम आपकी आवाज़ को जगह देना है।
चाहें तो तारीख और जगह लिख लें। बाद में पढ़ते समय ये छोटे संकेत स्मृति को संदर्भ देते हैं। हर दिन लिखने का कठोर नियम बनाने के बजाय अपने लिए सुविधाजनक लय खोजें।
अपने पन्ने की सीमा तय करें
निजी बातें लिख रहे हों तो यह भी तय करें कि डायरी कहाँ रखेंगे और किससे साझा करना चाहते हैं। हर अनुभव को प्रकाशित करना आवश्यक नहीं।
एक सप्ताह बाद कोई पुराना पन्ना पढ़ें। कौन-सी बात बार-बार लौटी? किस चीज़ पर आपकी नज़र पहले से अधिक ठहरने लगी? इसी छोटे अवलोकन में आगे लिखने का सूत्र मिल सकता है।


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